Repo Rate, Inflation और Growth के आपस में क्या सम्बन्ध हैं?
16-01-2021 No Comments » UPSC - IAS Chandan Singh Virat ✅

रेपो रेट (Repo rate), मॅहगाई और आर्थिक विकास के आपस में क्या सम्बन्ध हैं? इनके घटने और बढ़ने पर आपकी जेब पर क्या प्रभाव पड़ता है?

रेपो रेट (Repo Rate) और मुद्रास्फीति (Inflation) में सम्बन्ध कुछ इस प्रकार है कि ये दोनों एक दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। अर्थात यदि रेपो रेट बढ़ता है तो मुद्रास्फीति (inflation) कम होती है और इसके विपरीत यदि रेपो रेट घटता है तो महगांई बढ़ जाती है।

इस लेख में हम ये भी समझने का प्रयास करेंगे कि रेपो रेट बढ़ने या घटने से हमारी जेब पर किस प्रकार सीधा प्रभाव पड़ता है।

प्रत्येक तिमाही में आपको सुनने में आता होगा कि रेपो रेट में कुछ न कुछ बदलाव हुआ है। जैसे ही भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) रेपो रेट बढ़ाता या घटाता है, समाचार पत्रों, और टेलीविजनों पर बड़ी हेडलाइन्स बन जाती है। क्या आपने कभी सोंचा है कि दरअसल इस न्यूज से आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है? आइये सबसे पहले ये जानते हैं कि रेपो रेट (repo rate) आखिर क्या है?

Read this also: UN and IHME Reports – 2020

रेपो रेट (Repo Rate) क्या है?

किसी भी अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए देश के भीतर उत्पादित की जा रही वस्तुओं और सेवाओं का हिसाब किताब रखना जरूरी होता है। ये हिसाब -किताब उसकी संख्या और मूल्यों पर आधारित होता है। मूल्य से मुद्राएं बनती है और मुद्राओं के परिचालन से वस्तुओं और सेवाओं का लेन-देन या आदान-प्रदान होता है।

इसलिए किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था उसकी मुद्राओं के प्रबंधन और विनिमयन पर निर्भर करती है। मुद्राओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए मौद्रिक नीतियां बनाई जाती है। हमारे देश में इन मौद्रिक नीतियों से संबंधित कोई भी निर्णय लेने का अधिकार भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को है।

भारतीय रिज़र्व बैंक, भारत का केंद्रीय बैंक है। अन्य शब्दों में इसे बैंकों का बैंक भी कहा जाता है। भारतीय रिज़र्व बैंक, बैंको को कर्ज देने के साथ-साथ बाजार की तरलता (Liquidity) को देखकर मुद्रा आपूर्ति (Money Supply) के संतुलन को बनाये रखने का कार्य भी करता है ताकि ज्यादा महंगाई न बढ़ जाये या फिर कहीं मंदी के कारण अर्थव्यवस्था में वृध्दि न रुक जाए।

जब भी कभी वाणिज्यिक बैंको (commercial banks ) के पास पैसों की कमी होती है, वे पैसे उधार लेने के लिए रिज़र्व बैंक के पास जाते है और रिज़र्व बैंक उन्हें एक विशेष दर पर पैसे उधार देता है जिसे रेपो दर या Policy Repo Rate के नाम से जाना जाता है। और सरल शब्दों में –

रेपो दर (Repo Rate) वह दर है जिस पर भारत का केंद्रीय बैंक (भारतीय रिज़र्व बैंक) किसी भी वाणिज्यिक (Commercial) बैंक को पैसे उधार देता है। रेपो रेट के माध्यम से रिज़र्व बैंक बाजार में तरलता और मुद्रास्फ़ीति को नियंत्रित करता है। वर्तमान में रेपो रेट की दर 4.00% है।

Read this also: ILO’s Convention 182

रेपो रेट (Repo Rate) क्यों महत्वपूर्ण है ?

एक विशेष अवधि के दौरान भारतीय रिज़र्व बैंक रेपो रेट को घटाता या बढ़ाता है या फिर इसे अपरिवर्तित रखता है। केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) का यह निर्णय भारतीय अर्थव्यवस्था में तरलता और मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकता है।

मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए RBI के लिए रेपो दर एक बहुत ही महत्वपूर्ण उपकरण है। RBI द्वारा दरों को बढ़ाने या काटने से वाणिज्यिक बैंकों के लिए उधार लेना अधिक महंगा या सस्ता हो जाता है।

इस प्रकार रेपो दर और मुद्रास्फीति का विपरीत संबंध है। यदि दर में वृद्धि की जाती है, तो यह मुद्रास्फीति को नीचे लाएगा और यदि दर कम हो जाती है, तो मुद्रास्फीति बढ़ जाएगी।

रेपो रेट में बदलाव आपको एक उपभोक्ता के रूप में कैसे प्रभावित करेगा?

इसमें किसी भी तरह का फेरबदल महंगाई (Inflation) और उपभोक्ता की खरीदने की शक्ति को प्रभावित करता है ।

ऋण पर प्रभाव: जब रेपो दर बढ़ती है, तो आपके ऋण (Loans) और अधिक महंगे हो जाते हैं। इसका मतलब यदि आप बैंक से लोन लेते है तो इसकी व्याज दरें उच्च होंगी (High interest rate on loans) इसके विपरीत जब रेपो दर गिरती है, तो आपके बैंक की ब्याज दरें भी गिर जाएंगी। और, आप अपने बैंक से कम ब्याज दर पर ज्यादा ऋण/कर्ज ले सकते हैं।

जमा पर ब्याज पर प्रभाव: यदि बैंक द्वारा आपके लिए रेपो दर में कटौती की जाती है, तो आप अपनी जमा राशि पर कम ब्याज कमाएंगे।

यदि ब्याज दरों में वृद्धि होती है, तो जमाकर्ताओं को अधिक बचत करने के लिए लुभाया जा सकता है, जिससे कम धन खर्च हो सकता है।

रेपो रेट, मुद्रास्फीति तरलता और ग्रोथ में आपसी सम्बन्ध

मुद्रास्फीति/मॅहगाई (Inflation) की स्थिति में, केंद्रीय बैंक रेपो दर (Repo Rate/Policy Repo Rate) में वृद्धि करते हैं क्योंकि यह केंद्रीय बैंक से उधार लेने के लिए बैंकों के लिए एक विघटनकारी के रूप में कार्य करता है। यह अंततः अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति/तरलता (Liquidity) को कम करता है और इस प्रकार मुद्रास्फीति/महगाई को नियंत्रित करने में मदद करता है।

ज्यादा महगाई से मुद्रा का मूल्यह्रास (Currency depreciation) होता है जो ग्रोथ पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इसी तरह अपस्फीति (Deflation), अपस्फीति को सामान्य मूल्य स्तर में गिरावट के रूप में परिभाषित किया गया है, यह मुद्रास्फीति की नकारात्मक दर है,
अपस्फीति के साथ समस्या यह है कि अक्सर यह कम आर्थिक विकास (Slow economic development) का कारण बनता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपस्फीति से ऋण का वास्तविक मूल्य बढ़ जाता है – और इसलिए फर्मों और उपभोक्ताओं की खर्च करने की शक्ति कम हो जाती है।

इसके अलावा, गिरती कीमतें खर्च को हतोत्साहित करती हैं क्योंकि उपभोक्ता अपनी खरीदारी में देरी करते हैं।
अपस्फीति आवश्यक रूप से खराब नहीं है – खासकर अगर यह बढ़ी हुई उत्पादकता के कारण होता है। लेकिन अक्सर अवस्फीति की अवधि के कारण आर्थिक ठहराव और उच्च बेरोजगारी हुई है।

अपस्फीति (Deflation) की स्थिति किसी देश के लिए तब और भयावह हो सकती है जब शेयर मार्केट में गिरावट के कारण विदेशी कम्पनियाँ निवेश ज्यादा करने लगती हैं।

मंदी की स्थिति में कम पैसे में उस राष्ट की ज्यादा सम्पदा खरीदी जा सकती है। कई अवसरवादी देश इस तकनिकी का प्रयोग किसी राष्ट्र में अपने एकाधिकार (Business Monopoly) को बढ़ने के लिए करते हैं।

Read this also: The Indus Waters Treaty – 1960.

Leave a reply